Tuesday, November 18, 2008

बादामी, ऐहोले, पत्तदकल - I

इस भ्रमांड के इतिहास में
कुछ पन्ने मेरे भी हैं

सदियों पहले, मैंने जनम लिया
इस धरती पर अपनी छाप छोड़ी
आने वाली पीड़ियों के लिए
पथ्हरों को चीर कर लिखी
मेरे युग की कहानियां

सैंकडों शिल्पकारों को सिखाया
शिल्पी बन कहानियां लिखने का गुर
फिर उनके हाथों के जादू ने
पिरोया इतिहास कुछ यूँ की

पत्थर बोल उठे, नाच उठे
कभी कहानी सुनते तो कभी
पूछते तुमसे पहेलियाँ, कभी
एक निर्मल छवि बस देते हुए

देखोगे तो पाओगे छोडी हैं मैंने
केवल शिल्प्कारियों की कला
पर उन पलों का लेखा जोखा
जिनको था मैंने देखा और जिया

वो उन्माद और वो उल्हास
जो देता आया है आनंद और जीवन
वो देवी देवता, जिनसे ले पाठ
आज भी तुम देते लेते हो दिशा

वो नौ रस और कलाएं
वो जीव जंतु और क्रीडाएं
जो मिली धरोहर में और
जिनको संभाला पाला तुम्हारे लिए

छोडे हैं अपने समय के निशान
झीलों के किनारे, पहाडों के ऊपर
स्तंभों पे, दीवारों पे, छत पे
सीडियों पे, कलाकृतियों में

यह धरोहर है मेरे जीवनकाल की
छोड़ आई जिसे तुम्हारे लिए
इसे संभल रखना उनके लिए जो
अभी आये नहीं मुझसे मिलने

3 comments:

vineeta said...

It takes ages for a history like this to be born..........

Nikunj said...

Beautiful lines...

Vijay's Blog said...

Absolutely marvelous. I love the last lines especially when we as humans go away from this world not touching what belongs to the nature or has become a part of it to be accepted as nature itself.